नेपाल की मौजूदा स्थिति

नेपाल इस समय गहरे राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। देशभर में फैले “जेन-ज़ी विरोध प्रदर्शनों” ने व्यापक अशांति और अस्थिरता पैदा कर दी है।


1. प्रधानमंत्री ओली का इस्तीफ़ा

नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने मंगलवार, 9 सितम्बर 2025 को पद से इस्तीफ़ा दे दिया। यह फैसला भ्रष्टाचार-विरोधी प्रदर्शनों के तेज़ होने के बीच लिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, वे सेना के हेलीकॉप्टर से काठमांडू से रवाना हुए।


2. विरोध प्रदर्शनों के कारण

प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में मुख्य रूप से दो वजहें सामने आईं:

  • भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश
  • सोशल मीडिया पर लगाया गया प्रतिबंध

इसके अलावा, लोगों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश और पुलिस की हिंसा को लेकर भी गहरा असंतोष था।


3. हिंसा और जनहानि

प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया।

  • सोमवार को हुई झड़पों में 19 लोगों की मौत हुई।
  • 100 से अधिक लोग घायल हुए।
  • बीते दो दिनों में, काठमांडू और संघीय संसद भवन के आसपास हुई झड़पों में 500 से ज्यादा लोग घायल हुए।

4. प्रदर्शनकारियों की गतिविधियाँ

कर्फ़्यू की परवाह किए बिना प्रदर्शनकारियों ने कई हिंसक और प्रतीकात्मक कार्रवाइयाँ कीं:

  • वाहनों में आग लगाकर सड़कों को जाम करना।
  • नेपाल सरकार के मुख्यालय सिंह दरबार को आग के हवाले करना।
  • नेपाली कांग्रेस पार्टी कार्यालय को जलाना।
  • दंगा नियंत्रण पुलिस से ढाल, बूट और जैकेट छीन लेना।
  • संसद भवन के बाहर और कर्फ़्यू के दौरान नारे लगाना।

5. सरकारी प्रतिक्रिया

प्रदर्शनों के आरंभ में सरकार ने सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया था। लेकिन जब आंदोलन और अधिक उग्र हुआ, तो यह प्रतिबंध हटाना पड़ा।


6. बलेन्द्र शाह पर बढ़ता ध्यान

प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफ़े के बाद अब सबकी नज़रें काठमांडू के युवा मेयर बलेन्द्र शाह पर टिक गई हैं।

  • उम्र: 35 वर्ष
  • पृष्ठभूमि: रैपर से नेता बने
  • पहचान: अपने गीतों में भ्रष्टाचार पर चोट करने के लिए मशहूर

ऑनलाइन अभियानों में शाह को नेपाल के संभावित अगले नेता के रूप में पेश किया जा रहा है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील करते हुए कहा कि उनकी प्रमुख माँग (प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा) पूरी हो चुकी है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुँचाना अंततः देश की ही हानि होगी।


निष्कर्ष

नेपाल इस समय एक नाज़ुक मोड़ पर है। युवाओं के आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोल दिया है, लेकिन देश की स्थिरता, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और भविष्य के नेतृत्व की दिशा अब अगले कुछ महीनों में तय होगी।